ISSN 2250 - 1959 (online) ISSN 2348 - 9367 (Print) New DOI : 10.32804/IRJMST



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आदर्शोन्मुखी यथार्थवाद और प्रेमचन्द

    1 Author(s):  SUMAN DEHMAN

Vol -  10, Issue- 4 ,         Page(s) : 41 - 45  (2019 ) DOI : https://doi.org/10.32804/

Abstract

विद्वानों ने साहित्य में सत्यम्ए शिवम्ए सुन्दरम् की अनिवार्यता को मुक्त कंठ से स्वीकार किया है।इस सत्यम्ए शिवम्ए सुन्दरम् के लिऐ आज श्आदर्शश् और श्यथार्थश्शब्दों का प्रचलन हो गया है।जीवन की किसी भी परिस्थिति एघटनाए वस्तु ए पहलू एया समस्या का ज्यों का त्यों वर्णन करना ही यथार्थ कहलाता है। लेखक जीवन को जिस रूप में देखता या अनुभवए उसी को अक्षरशःसत्य रूप में वर्णन कर देना यथार्थवाद की रूपरेखा है।यथार्थवादी कलाकर जीवन को उसके वास्तविक रूप में ग्रहण करके उसका यथा तथ्य वर्णन करता है। यथार्थवादी कलाकार पूर्णतः तटस्थ होकर जीवन की गतिविधियों को देखता है और उन्हें बिना किसी राग . विराग का आरोप किए हुए चित्रित कर देता है।यथार्थवाद के ठीक विपरीत आदर्शवाद होता है जिसमे वस्तु को यथार्थ रूप मे न रखकर लेखक अपने संस्कार के आधार पर मानव मात्र के लिए हितकर नीतियुक्त और कल्याणकारी समझकर अपनाने के उद्देश्य से सामने रखा।

1.   बुल्के, कामिल, अंग्रेजी-हिंदी कोश ,राँची:काथलिक प्रेस,1985,पृष्ठ-543
2.   दृष्टव्य-धनजंय(सम.),समकालीन कहानी दिशा और दृष्टि, इलाहाबाद:अभिव्यक्ति प्रकाशन,1970,पृष्ठ-100
3.   DANIAN GRANT:REALISM,ED-J-D,GREAT BITAIN:JUMP,1974, P -6
4.   रुज,डब्ल्यू०एच०डी०(अनुवादक),ग्रेट डॉयलोग्स ऑफ प्लेटो,1957, पृष्ठ -302
5.   हीगेल, जी०डब्ल्यू०एफ०,फिलॉफिकल हिस्ट्री, इनकॉरपोरेटेड इन "मैन एंड द स्टेट" पृष्ठ - 487
6.   मार्क्यूस, एच०रीजन एंड रिवोल्यूशन पृष्ठ - 268
7.   प्रेमचन्द, 'कुछ विचार', पृष्ठ - 67
8.   प्रेमचन्द, 'साहित्य का उद्देश्य' , पृष्ठ - 63
9.   वही, पृष्ठ - 21
10.  'मंगलसूत्र' - प्रेमचन्द स्मृति, पृष्ठ - 298

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